मेरी उलझन ही सबकी उलझन
लेखक - चन्द्रशेखर साहू
चाहे अचल पहाड से निकली अविरल जल की धार जो नदी की धारा में परिवर्तित हो जाती है। चाहे सूर्य से निकली मंद सी मुस्काती आभा जो तेज चुभन सी प्रतीत होती हुई कुछ घंटों में ही शांत हो जाती है।
चाहे मां के गर्भ से जीवन के अंत तक का सफर किसी भी जीव का। जरा इन सब उदाहरणों पर गौर करें तो आसानी से समझ सकतें हैं कि काल या समय के अनुरुप सिर्फ दशाएं या उनकी परिस्थितियां बदलती है। मूल भैतिक स्वरुप तो हर अवस्था में ही अपरिवर्तित है। पहाड सेे निकला जल तो फिर जल ही है चाहे नदी में बहता हुआ समुद्र तक का सफर तय करे। सूर्य की किरण का प्रारुप भी कुछ ऐसा ही है। इसी तरह मानव भू्रण में जब चेतना तत्व की प्राप्ति होती है तो अंत तक भी वह चेतन स्वरुप में होता है। शायद मौत के बाद भी वह आत्मा जो कि एक चेतन ही है में तब्दील हो जाता है।



